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“हमसे का भूल हुई, जो ये सजा हमको मिली…” जिला मुख्यालय ‘ऑफलाइन’, घोषणाएं ‘ऑनलाइन’ — पांढुर्णा के साथ ये कैसा डिजिटल रिश्ता

“हमसे का भूल हुई, जो ये सजा हमको मिली…”
जिला मुख्यालय ‘ऑफलाइन’, घोषणाएं ‘ऑनलाइन’ — पांढुर्णा के साथ ये कैसा डिजिटल रिश्ता?

संवाददाता धनंजय जोशी

जिला पांढुरना मध्य प्रदेश

कभी जिला बनने पर खुशियों से झूमने वाला पांढुर्णा आज सवालों में घिरा है। विकास के सपनों की जगह अब तंज और तकरार ने ले ली है। हालात ऐसे हैं कि मुख्यालय खुद को जिले का “VIP” नहीं, बल्कि “Ignored Person” महसूस करने लगा है।
शिवराज सिंह चौहान ने जिस उम्मीद के साथ पांढुर्णा को जिला बनाया था, वह अब धीरे-धीरे व्यंग्य का विषय बनता जा रहा है।
और मौजूदा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के दौरे इस व्यंग्य को और धार दे रहे हैं।

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“मुख्यालय से दूरी… कहीं मजबूरी तो नहीं?”
मुख्यमंत्री का जिला दौरा तय होता है…
कार्यक्रम भी होते हैं…
भूमिपूजन भी होता है…
बस अगर कुछ नहीं होता, तो वो है—मुख्यालय का दौरा।
अब 26 मार्च को भी वही पटकथा—
जामसांवली में मौजूदगी, वहीं से वर्चुअल बटन दबाकर पांढुर्णा के विकास कार्यों की शुरुआत। कलेक्टर कार्यालय, sp कार्यालय, भाजपा जिला कार्यालय, रेलवे ओवर ब्रिज जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स जो जिला मुख्यालय की धरा पर आकार लेंगे, लेकिन जिला मुख्यालय इन  भूमिपूजन कार्यक्रमो को दूर से निहारेगा।मतलब साफ है—
“विकास पांढुर्णा का, लेकिन उपस्थिति कहीं और की।”

‘वर्चुअल विकास मॉडल’ का नया प्रयोग
पांढुर्णा शायद प्रदेश का पहला ऐसा जिला बन रहा है जहां—
मुख्यमंत्री आए बिना भी आ जाते हैं
भूमिपूजन हुए बिना भी हो जाता है
लोग अब तंज कस रहे हैं—
“यहां सड़कों से पहले ‘नेटवर्क’ मजबूत होना जरूरी है, क्योंकि विकास ऑनलाइन जो हो रहा है!”

तीसरी बार वही कहानी
एक बार होता तो संयोग कहा जाता…
दो बार होता तो प्रोटोकॉल…
लेकिन तीसरी बार… अब इसे क्या कहा जाए?
राजनीतिक गलियारों में फुसफुसाहट तेज है—
“क्या पांढुर्णा मुख्यालय ‘लो-प्रायोरिटी ज़ोन’ बन गया है?”
या फिर “यह दूरी ही कोई बड़ा राजनीतिक संदेश दे रही है?”

राजनीति के अंदर की राजनीति
कलेक्टर कार्यालय की लोकेशन पर हुए विरोध, फिर निर्णय में बदलाव—
इन सबने पहले ही सियासी माहौल को गरम कर रखा है।
अब मुख्यालय से दूरी ने इस आग में घी डालने का काम किया है।
विश्लेषक मानते हैं कि—
“यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि सियासी समीकरणों का हिस्सा भी हो सकता है।”

कार्यकर्ता भी ‘साइलेंट मोड’ में
सत्ताधारी दल के स्थानीय कार्यकर्ता खुलकर कुछ नहीं कह रहे,
लेकिन उनकी खामोशी बहुत कुछ कह रही है।
“जिला हमारा… सरकार हमारी…
फिर भी मुख्यालय पर कार्यक्रम नहीं—ये कैसा गणित है?”

जनता का सीधा, सख्त सवाल
अब जनता पूछ रही है—
“क्या पांढुर्णा सिर्फ नक्शे पर जिला है?”
“या फिर मुख्यालय का ‘लोकेशन’ ही राजनीति में फिट नहीं बैठ रहा?”

आखिरी वार
पांढुर्णा को अब घोषणाएं नहीं, हाजिरी चाहिए।
वर्चुअल बटन नहीं, वास्तविक कदम चाहिए।
वरना हालात ऐसे ही रहेंगे और हर दौरे पर यही गूंजेगा—
“हमसे का भूल हुई, जो ये सजा हमको मिली

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